Wednesday, August 29, 2012

Ye aag nahi bhujegi

भड़क रहा है कुछ इस सीने में
लगता है आग लगी है अब जीने में
गुज़रती सांसों में उमड़ रहा है एक तूफ़ान
इस घोर निद्रा से उठने का आह्वान
जो सुलग रहा है दहकने के लिये

जिधर देखो अंधे नज़र आते हैं
जहाँ कान लगाओ बहरे सुनाई देते है
जुबां पे लगाम रखे
बेजुबां बंदर नज़र आते हैं !

अर्धखुशी में झूम रहा है गाँधी
ना सुनो, ना बोलो, ना देखो
यही है इन बंदरो का जीवन नारा

हे बन्दर! कभ तक इस भेड़चाल में कूदेगा
कभ तक कुछ फेंके हुए केलो कि आरती उतारेगा
अरे आँख खोल के देख
तेरे फेंके हुए छिल्को पे कहि
तेरा ही चाहने वाला ना फिसल जाये

आसमाँ का रंग लाल होगा
बंदरों के बहते खून से सिंचेगी ये धरा
और बचे इंसानों के हाथ में हल होगा

तलवार से टपकते खून
उन मरते बंदरों कि चिहाड़
सूखे जुबां से गुज़रती  साँसे
सब मन के तूफ़ान में गुमशुदा होंगे

Neither fear nor guilt has any role to play
There should be no mercy for mercenaries
Those who line their bellies
With intestines of their starving brothers.
Skin them, pull their tendons apart bit by bit
Don't let them pass out
Let them hear the grinding of their own bones.

फ़िर से आग लगाना है
इस आबाद बंदरों कि बस्ती को जड़ से मिटाना है
चलो वापस उस दिन कि ओर
जब खुद खाने से पहले वो देखे
कहि कोई भूखा तो नहीं सो गया !

इस तूफ़ान के बाद
फिर से लाल सूरज निकलेगा
यह सिर, ना इन्सां ना किसी भगवान के लिए झुकेगा
जब तक साथ रहेंगे
तब तक साथ सोचेंगे, और ये समझेंगे
कि ना ये ज़मीन तुम्हारा है, ना ये आसमां तुम्हारा है
ख़त्म होगा ये 'मेरा', ये 'तुम्हारा'
सिर्फ एक शब्द लफ़्ज़ों पर सजेगा,
हमारा, हमारा, हमारा!!

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